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आयुष्मान खुराना ने ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में लिया है इस बीमारी का नाम

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आयुष्मान खुराना ने 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' में लिया है इस बीमारी का नाम

आयुष्मान खुराना ने फिल्म शुभ मनागल ज्यादा सावधान में होमोफोबिया का जिक्र किया है

आयुष्मान खुराना (Ayushmann Khurrana) ने आगामी फिल्म ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान (Shubh Mangal Zyada Saavdhan)’ में ‘गे’ की भूमिका निभायी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated:
    January 21, 2020, 11:26 AM IST

बॉलीवुड (Bollywood) एक्टर आयुष्मान खुराना (Ayushmann Khurrana) की आगामी फिल्म ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान (Shubh Mangal Zyada Saavdhan)’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. इस फिल्म में आयुष्मान खुराना ने ‘गे’ की भूमिका निभायी है. फिल्म के एक सीन में वो छत पर चढ़कर ऐलान करते हैं कि उन्हें होमोफोबिया है और इसका कोई इलाज नहीं है. ये सुनकर उनके फैमिली वाले बौखला जाते हैं. आइए जानते हैं इस फोबिया के बारे में जिसका नाम आयुष्मान खुराना अपनी फिल्म में लिया है.

क्या है होमोफोबिया?
फिल्म में आयुष्मान खुराना ने कहा है कि उन्हें होमोफोबिया है जोकि लाइलाज है. होमोफोबिया शब्द का इस्तेमाल दरअसल उस नजरिए के लिए किया जाता है जिसमें लोग या समाज समलैंगिकों (homosexual) या उभयलिंगी (bisexual) (जो स्त्री और पुरुष दोनों के प्रति रुझान रखता हो) लोगों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है. ट्रेलर के ही एक अन्य सीन में आयुष्मान कहते हैं कि जो प्यार लोगों के दिमाग में फिट नहीं बैठता है उसे दबा दिया जाता है. दरअसल, समाज में केवल स्त्री और पुरुष के प्रेम या संबंधों को ही सामान्य नजरिए से देखा जाता है ऐसे में समलैंगिकों (homosexual) या उभयलिंगी (bisexual) लोगों को समाज के ज़्यादातर लोग हेय द्रष्टि या अपमान की भावना से देखते हैं. इसे ही होमोफोबिया कहा जाता है.

इसे भी पढ़ें: सुबह की थकान होगी गायब, बस करने होंगे ये कामएक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या में समलैंगिकों की संख्या 0.2 फीसदी है. केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी के अनुसार भारत में समलैंगिकों की संख्या लगभग 20 लाख है. भारत में बेशक इन चीजों को खुले तौर पर अपनाया न हो, लेकिन विदेशों में दो समलैंगिकों के रिश्तों को संसद तक में अपनाया गया है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में ऑ की संसद में बहस के दौरान सांसद टिम विल्सन ने अपने पार्टनर को प्रपोज किया था. इतना ही नहीं ब्रिटेन के 14 सासंदों ने भी खुद को होमोफोबिया का शिकार बता चुके हैं.

बता दें कि ब्रिटेन ने 1967 में अपने देश में समलैंगिकता और पुरुषों के बीच सहमति से बनने वाले संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था. ब्रिटेन ही नहीं बेल्जियम, नीदरलैंड्स, कनाडा, स्पेन, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, अर्जेंटीना, स्वीडेन, पुर्तगाल जैसे देशों में भी इस तरह से संबंधों को अपराध नहीं माना जाता है.

होमोफोबिया का इलाज है संभवगुड थैरेपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, होमोफोबिया का इलाज संभव है. होमोफोबिया का इलाज घर से किया जा सकता है. इसके लिए परिवार के बाकि समस्योंं को होमोफोबिया का शिकार शख्स से बातचीत करने की जरूरत होती है.

– रिपोर्ट के अनुसार होमोफोबिया का शिकार लोग किसी से भी ज्यादा बात नहीं करते हैं और अपने ही तरह के लोग खोजते हैं, जिसकी वजह से वो अलग हो जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि परिवार और दोस्तों से उन्हें स्पोर्ट दिया जाए.

– स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के अनुसार होमोफोबिया का इलाज आसानी से किया जा सकता है. होमोफोबिया के इलाज के प्रोसेस को रिपैरेटिव मेडिकल ट्रीटमेंट कहा जाता है.

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First published: January 21, 2020, 11:26 AM IST



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देश के इन 3 शहरों में थम रहा है कोरोना का कहर, लेकिन वैज्ञानिकों ने दी ये चेतावनी

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नई दिल्ली: हाल ही में आए एक अध्ययन में पता चला है कि कोविड-19 के आर-वैल्यू या रिप्रोडक्टिव वैल्यू में दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में गिरावट आई है जो दर्शाती है कि देश के तीन बड़े शहरों में इस महामारी का कहर थमने की राह पर है.

हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी भी दी है कि इस स्तर पर आकर अगर लापरवाही की गई तो संक्रमण फिर से बढ़ सकता है. इस बीच ‘स्टैटिस्टिक्स एंड एप्लिकेशंस’ पत्रिका में प्रकाशित ताजा आर-वैल्यू कुछ इस प्रकार हैं. दिल्ली में यह 0.66, मुंबई में 0.81 और चेन्नई में 0.86 है जो राष्ट्रीय औसत 1.16 से काफी कम है.

आर-वैल्यू का अर्थ है, एक संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आकर औसतन संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या. फिलहाल देश में सबसे ज्यादा आर-वैल्यू 1.48 आंध्र प्रदेश की है.

दिल्ली के 0.66 आर-वैल्यू को और बेहतर तरीके से समझाते हुए इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाली चेन्नई के गणितीय विज्ञान संस्थान में भौतिकी की प्रोफेसर सीताभ्रा सिन्हा ने बताया, इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय राजधानी में कोरोना वायरस से संक्रमित किन्हीं 100 लोगों का समूह औसतन 60 लोगों को यह संक्रमण दे सकता है.

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, कोलकाता में भौतिकी के प्रोफेसर दिव्येन्दु नंदी ने कहा ‘समुदाय में आर-वैल्यू का इतना कम बने रहने का अर्थ है कि महामारी का मौजूदा कहर थम रहा है और इसे नियंत्रित करने वाले उपायों की मदद से निकट भविष्य में काबू किया जा सकता है.’

उन्होंने बताया कि सामान्य तरीके से समझें तो, अगर आर-वैल्यू एक से कम है तो इसका सीधा मतलब है कि एक संक्रमित व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा एक अन्य व्यक्ति को संक्रमित कर रहा है.

महामारी के ‘पूर्ण उन्मूलन’ तक फिलहाल जारी पाबंदियों को लागू रखने पर जोर देते हुए नंदी ने कहा, ‘हमें अपनी सावधानी नहीं छोड़नी चाहिए.’

हरियाणा के अशोक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर गौतम मेनन ने कहा, सामान्य भाषा में कहें तो आर-वैल्यू इसकी गिनती करता है कि औसतन कितने लोग एक संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से बीमारी का शिकार हो सकते हैं.

उनका मानना है कि रोजाना के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली, चेन्नई, मुंबई में यह दिख रहा है कि महामारी का कहर थमने लगा है.

मेनन का कहना है कि शहरों में हो रहे सीरो-सर्वे से पता चलता है कि मुंबई और दिल्ली के करीब 40 प्रतिशत या उससे ज्यादा निवासी इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं.

मेनन ने कहा, ‘दूसरे देशों से हमने जो देखा/सीखा है, उससे पता चला है कि समुदाय के स्तर पर किसी बीमारी विशेष के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के लिए आबादी के कम से कम 20 प्रतिशत का संक्रमित होना आवश्यक है.’

उन्होंने कहा, ‘ऐसे में, यह सच है कि कहर थम रहा है, लेकिन अगर हम सतर्क नहीं रहे और एहतियात छोड़ा तो यह फिर बढ़ सकता है.’

दिल्ली में रविवार को कोविड-19 के 961 नए मामले आने के साथ ही अभी तक कोरोना वायरस से संक्रमित हुए लोगों की संख्या बढ़कर 1,37,677 हो गयी है. इनमें से कुल 1,23,317 लोग इलाज के बाद संक्रमण मुक्त हो चुके हैं. शहर में एक दिन में सबसे ज्यादा 23 जून को 3,947 नए मामले सामने आए थे.

मुंबई शहर में रविवार को 1,105 नए मामले आए हैं. शहर में अभी तक 1,16,436 लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हो गई है. शहर में पिछले दो महीने में एक दिन में सबसे कम 717 नए मामले 28 जुलाई को आए.

चेन्नई में आज 1,065 नए मामले सामने आए हैं. शहर में अभी तक 1.01 लोग संक्रमित हुए हैं.

(इनपुट: भाषा )

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50 की उम्र के बाद लें ज्‍यादा प्रोटीन, मांसपेशियां रहेंगी मजबूत

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उम्र बढ़ने से आपकी मांसपेशियों (Muscles) की ताकत कम हो जाती है, इसलिए बढ़ती उम्र के साथ आहार (Diet) में ज्यादा प्रोटीन (Protein) शामिल करने की आवश्यकता होती है. बढ़ती उम्र के साथ मांसपेशियों को मजबूत रखने के लिए प्रोटीन की जरूरत को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. एक वयस्क (Adult) यानी 18 से ज्यादा उम्र वाले व्यक्ति के लिए डाइटरी प्रोटीन शरीर के वजन का 0.8 ग्राम प्रति दिन होना चाहिए, लेकिन कुछ अध्ययनों (Studies) से पता चलता है कि 65 साल की आयु के वयस्कों के लिए भी इस पोषक तत्व के उच्च स्तर की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि मांसपेशियां उम्र के साथ अपनी ताकत खो देती हैं. इससे कार्यक्षमता पर असर पड़ता है. अगर सार्कोपेनिया से पीड़ित हैं, तो स्थिति और खराब हो जाती है, जिससे मांसपेशियों में नुकसान होता है.

उम्र बढ़ने के साथ-साथ मांसपेशियां कमजोर होना शुरू हो जाती हैं. इस अवस्था को सार्कोपेनिया कहा जाता है. myUpchar के डॉ. लक्ष्मीदत्ता शुक्ला का कहना है कि शरीर के लिए प्रोटीन बहुत जरूरी होता है और शरीर में मौजूद हर जीवित कोशिका को प्रोटीन की जरूरत होती है. यह मुख्य रूप से एमिनो एसिड से बने होते हैं और कोशिकाओं को एनर्जी देते हैं. सुबह के नाश्ते और दोपहर के खाने में संतुलित मात्रा में प्रोटीन लेना लाभदायक हो सकता है. इससे उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्ग लोगों की मांसपेशियों को मजबूत रखने में मदद मिलती है.

यह पाया गया है कि बुजुर्गों का शरीर प्रोटीन में कम मात्रा में मौजूद अमीनो एसिड को बहुत कम रिस्पॉन्ड करता है. ये एसिड  मांसपेशियों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करते हैं. अरकंसास यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध में पता चला है कि इस चुनौती को बुजुर्गों में प्रोटीन का सेवन बढ़ाकर दूर किया जा सकता है. अध्ययन के अनुसार प्रोटीन उनके कुल कैलोरी सेवन का 30-35 प्रतिशत होना चाहिए. दूसरी ओर सार्कोपेनिया से पीड़ित एक वयस्क को प्रति दिन 25 से 30  ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है अगर उसके शरीर का वजन 81 किलोग्राम है.जहां प्रोटीन की मात्रा महत्वपूर्ण है, वहीं इस पोषक तत्व का सही वर्जन चुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. ल्यूसीन नाम के एमिनो एसिड को चुनें. इसके लिए सबसे अच्छा स्रोत मछली, अंडे, दूध और डेयरी उत्पाद हैं. इसे सोयाबीन, अन्य बीन्स, नट्स और बीजों से भी प्राप्त कर सकते हैं. ये हाई प्रोटीन फूड्स शामिल कर सकते हैं.

फलियां
ये सब्जियों का वह वर्ग है, जिसमें बीन्स, मटर और दाल शामिल हैं. वे सबसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों में से हैं और प्रोटीन का भी एक अच्छा स्रोत हैं. विशेष रूप से शाकाहारियों के लिए फलियां मीट का एक स्वस्थ विकल्प हो सकती हैं, जिसमें वसा और कोलेस्ट्रॉल अधिक होता है.

सैल्मन मछली

सैल्मन मछली ओमेगा-3 फैटी एसिड और प्रोटीन का बेहतर स्त्रोत है. इसमें लो फैट होता है. यह सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है. मछली में विभिन्न प्रकार के विटामिन, मिनरल्स और कई अन्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं. इसलिए मछली का सेवन शरीर की कई जरूरतों को पूरा करता है.

अंडे
एक अंडे में औसतन लगभग 6-7 ग्राम प्रोटीन होता है. हालांकि बहुत से लोग सोचते हैं कि प्रोटीन केवल अंडे की सफेदी में पाया जाता है, लेकिन अंडे की जर्दी ऐसी होती है जहां लगभग सभी पोषक तत्व और वसा पाए जाते हैं. अंडा प्रोटीन के अलावा कैल्शियम और ओमेगा-3 फैटी एसिड का भी स्त्रोत है.

ये भी पढ़ें – डेली रुटीन में हो जाती हैं ये गलतियां, सेहत के लिए हैं बेहद बुरी

दही
दही प्रोटीन का एक बेहतरीन स्त्रोत है. प्रोटीन की हर कमी को पूरा करने में दही बहुत प्रभावशाली है. यह व्यक्ति की उम्र बढ़ाने में मददगार है.

कॉटेज चीज
कॉटेज चीज में फैट और कैलोरी कम होती है. प्रोटीन का एक बड़ा स्रोत होने के अलावा, इस प्रकार के चीज में कैल्शियम, फास्फोरस, सेलेनियम, विटामिन बी12 और अन्य आवश्यक पोषक तत्व होते हैं.

अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, मासपेशियों में दर्द के प्रकार, कारण, बचाव, इलाज और दवा पढ़ें।

न्यूज18 पर स्वास्थ्य संबंधी लेख myUpchar.com द्वारा लिखे जाते हैं। सत्यापित स्वास्थ्य संबंधी खबरों के लिए myUpchar देश का सबसे पहला और बड़ा स्त्रोत है। myUpchar में शोधकर्ता और पत्रकार, डॉक्टरों के साथ मिलकर आपके लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सभी जानकारियां लेकर आते हैं।



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कोरोना: टेस्‍ट के मामले में भारत ने बनाया अनोखा रिकॉर्ड, जानकर हो जाएंगे हैरान

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नई दिल्ली: देश में कोरोना वायरस की स्थिति को लेकर जानकारी देते हुए केंद्र सरकार ने सोमवार को कहा कि भारत ने कोविड-19 संबंधी दो करोड़ से अधिक टेस्ट किए हैं जो एक ‘महत्वपूर्ण उपलब्धि’ है.

सरकार ने कहा, ‘संक्रमित लोगों का समय पर पता लगाने और उन्हें समय रहते आइसोलेशन में भेजने और जल्द उपचार शुरू करने की महत्वपूर्ण रणनीति के तहत इस कवायद को अंजाम दिया गया. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कहा कि दो अगस्त तक कुल 2,02,02,858 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 3,81,027 नमूनों की जांच रविवार को हुई.’

भारत में छह जुलाई को जांच की संख्या एक करोड़ का आंकड़ा पार कर गई थी.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पिछले 24 घंटे में 3,81,027 नमूनों की जांच के साथ ही प्रति 10 लाख (टीपीएम) आबादी पर जांच की संख्या बढ़कर 14,640 हो गई है.

आंकड़ों के अनुसार देश के 24 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने प्रति 10 लाख की आबादी पर राष्ट्रीय औसत से अधिक जांच की हैं. इन राज्यों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक और पंजाब भी शामिल हैं.

मंत्रालय ने कहा, ‘एक महत्वपूर्ण उपलब्धि में भारत ने अब तक कोविड-19 संबंधी 2,02,02,858 जांच की हैं.’

देश में अब 1,348 जांच प्रयोगशालाएं हैं जिनमें 914 सरकारी और 434 निजी प्रयोगशालाएं हैं.

पुणे में राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) की एकमात्र प्रयोगशाला के साथ कोविड-19 जांच की शुरुआत हुई थी और फिर लॉकडाउन शुरू होने के आसपास तक 100 प्रयोगशालाओं में इसकी जांच शुरू हो चुकी थी, जबकि 23 जून को आईसीएमआर ने 1000वीं जांच प्रयोगशाला को मान्यता प्रदान की थी.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कोविड-19 के 52,972 नए मामले सामने आने के साथ सोमवार को संक्रमण के कुल मामले 18 लाख के आंकड़े को पार कर गए, जबकि संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों की कुल संख्या बढ़कर 11.86 लाख से अधिक हो गई.

सोमवार सुबह आठ बजे जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में कोरोना वायरस संक्रमण के कुल मामले 18,03,695 हो गए, जबकि कोविड-19 की वजह से 771 और लोगों की मौत के बाद इस महामारी से मरने वालों की संख्या 38,135 हो गई.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने पूर्व में कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों ने कोविड​​-19 संबंधी जांच बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया है.

(इनपुट: भाषा )

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